Vikas Meshram
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कोविड-19 के संक्रमण काल में हमें रोज भूखमरी ऐसे चित्र देखने को मिलते थे , जिनमें कई संस्थाएं जरूरतमंद परिवारों को राहत सामग्री प्रदान कर रही थी. वास्तव में, इस समय खाद्य सुरक्षा का विषय,
जीवन की सबसे अहम् जरूरत और सबसे बड़ी चुनौती बन गया है. लेकिन ऐसे में सबसे उपेक्षित और
कमज़ोर वर्गों द्वारा अपने बेहद सीमित संसाधनों से ऐसे परिवारों की मदद करना,
जिनमें कुपोषित बच्चे या गर्भवती या नवजात शिशुओं वाली माताएं और
वृद्ध सदस्य हैं| इन परिस्थितियों में इस्तेमाल किए गए
संसाधनों में एक है – जैविक पोषण वाटिका जिसे सरल भाषा में किचन गार्डन कह सकते है.
इस महामारी के समय में, 5 साल
से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती और नवजात शिशुओं वाली महिलाओं
के सामने पोषक तत्वों की कमी का संकट खड़ा हो गया. इसके
मुख्य कारण लॉकडाउन, आहार-कार्यक्रमों का व्यवस्थित सञ्चालन
न होना यही था. ऐसे
में, समाज ने अपनी आंतरिक ताकत का ही इस्तेमाल किया और
कुपोषण को बड़ा संकट बनने से रोका है | कुपोषण के विरुद्ध वागधारा की सच्ची खेती के तहत सामुदायिक
प्रबंधन कार्यक्रम संचालित कर रहे वागधारा
गठित सक्षम महिला समूह, को जैविक किचन गार्डन तैयार करने देशी बीज और तकनीकी में
अनेक परिवारों को सहायता की थी.
बांसवाडा जिले में सक्रिय
रूप से महिलाओं और बच्चों के पोषण के लिए काम कर रही,
आदिवासी महिला, ‘कांता डामोर बताती हैं –
“COVID-19 संक्रमण का फैलना शुरू होने पर, हमने
अपने वागधरा गठित बच्चो के अधिकार पर कार्य करने के लिए बाल पंचायत , एवम गाव के विकास हेतु ग्राम विकास व् बाल अधिकार
समिति ‘’ में यह
चर्चा की, कि इन परिस्थितियों में हम अपने गाँव के बच्चों और
गर्भवती एवं दूध पिलाने वाली माताओं के पोषण की व्यवस्था कैसे करेंगे? यह इसलिए जरूरी था, क्योंकि गाँव के लोग सप्ताह में
एक बार, 15 किलोमीटर दूर जाकर हफ्ते भर का राशन-पानी लेकर
आते हैं|” आगे कहती हैं – “लॉकडाउन
के कारण गंभीर चुनौती खड़ी हो गयी थी| तब हमने गाँव गाँव
जाकर दो काम किये – सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकान से
ज्यादा से ज्यादा लोगों को राशन दिलवाना और गर्भवती एवं दूध पिलाने वाली माताओं और
5 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए पोषण की व्यवस्था करना यह
कार्य हमने समुदाय में रहकर किये है . वागधारा सस्थान के
पोषण एवं कृषि विशेषज्ञ पी .एल पटेल कहते है की ‘’ बांसवाडा जिले के अपने कार्यक्षेत्र में हमने लगभग 1100
परिवारों को हमने किचन गार्डन तैयार करने में मदद की थी| चर्चा में तय हुआ कि सब्जियां उगाने वाले परिवार, जितना
संभव हो सके, बच्चों और महिलाओं के पोषण में सहयोग करें|
हम शुरू से सह-अस्तित्व की भावना को प्रोत्साहित करते रहे हैं.”
कुछ कहानियां सहयोग एवं संवेदना की
·
बांसवाडा जिले के चिकली तेजा गाँव की कपिला मणिलाल डामोर की दो बेटियां,
शीतल और तेजल , अतिगंभीर कुपोषण से पीड़ित थीं|
।वागधारा के मदत से २०२० में
उन्होंने जैविक किचन गार्डन शुरू किया,
जिससे उन्हें लगभग नौ महीने की सब्जियाँ मिलने लगी. इस तरह उनके परिवार से कुपोषण का खतरा तो कम हुआ ही, साथ ही वे बाज़ार में भी कुछ सब्जियां बेचने लगे|और जरूरतें पूरी करने के बाद, गांव के ही जरूरतमंद लोगों, जैसे – चम्पादेवी भाभोर , सविता डामोर , इटली डामोर रमिला मकवाना , को भी हर हफ्ते दो-तीन बार सब्जियां देनी शुरू की. रमिला मकवाना कहती हैं कि “हमें पता था कि कपिला की आर्थिक स्थिति खराब है और उसकी बेटी कमज़ोर
(कुपोषित) भी है| इसलिए हमें लगा कि उनके परिवार की मदद की
जानी चाहिए| संकट
के समय में अगर हम एक दूसरे का साथ नहीं
देंगे तो कौन देगा?” गाँव के ललिता मकवाना के यहाँ सब्जियों के अलावा कटहल, अमरुद और आम
के पेड़ भी हैं| वे
उन सात परिवारों को सब्जियां दे रहे हैं, जिनमें
कुपोषित बच्चे या गर्भवती महिलाएं हैं| उनका कहना है कि “बीमारी का तो डर है, किन्तु हमें अपने समाज के
बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा का भी ध्यान रखना है.”
·
बांसवाडा जिले के सेरा गाँव की आदिवासी महिला मनीषा डामोर
पिछले चार साल से किचन गार्डन लगा रही हैं|
उन्होंने आधे बीघे में टमाटर, तोरई, भिन्डी, बरबटी, पालक लगाए हैं| इससे उन्हें हर
महीने 3000 रूपए कमाई होती है, लेकिन COVID-19
के बाद से वे 10 जरुरतमंद परिवारों को निशुल्क सब्जी दे रही हैं।
सशक्तिकरण के प्रभाव – व्यापक
होती सोच
राजस्थान के बांसवाडा जिले की सुंदरव गाव की महिला उषा निनामा “महामारी
ने लोगों को बहुत भयभीत कर दिया है, किन्तु लोगों ने
परिस्थिति का सामना करने के रास्ते निकालने भी शुरू कर दिए हैं। इसमें सबसे आगे वह
महिलाएं रहीं, जो तीन-चार सालों से स्वास्थ्य, पोषण और नेतृत्व क्षमता विकास की प्रक्रिया से जुड़ी हुई हैं.”
राजस्थान में कुपोषण गंभीर
विषय है। यहाँ कुपोषित बच्चों के परिवार
बहुत जद्दोजहद करके अपनी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। COVID-19
से उत्पन्न हुई स्थितियों ने ज्यादा बड़ी समस्याएं खड़ी कर दीं|
लेकिन सामाजिक बदलाव के लिए किये जा रहे संस्थागत कार्यों के असर की
पड़ताल भी तो ऐसे ही संकट के समय में होती है| ऐसे में 135
गांवों में कुपोषण के खिलाफ , 5867 किचिन गार्डन और
महिला समूहों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण के प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे
हैं|
कुपोषण मिटाने के उद्देश्य से चलाये जा रहे कार्यक्रम में जल
संरचनाएं भी बनाई गयीं, बीजों का संरक्षण और खेती का विकास, किचिन गार्डन भी स्थापित की गईं हैं। सामाजिक बदलाव के लिए सामाजिक
संस्थानों द्वारा किए जा रहे सतत प्रयासों से समानुभूति एवं सहयोग का भाव तो पैदा
हो रहा है|

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